Wednesday, March 16, 2016

गर मैं कहूं कुछ... Comments

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गर मैं कहूं कुछ, क्या सुन सकोगे; रिश्ता, भुला कर हमे, बुन सकोगे?
महफ़िल भरी फितरतों से था वाकिफ; यकीं कर नहीं फ़िक्र करता कभी था,
मिली आज मंजिल कहे कोई कुछ भी, मुझे याद है जिक्र करता तब भी था |
बनी जिंदगानी, ये ऐसी कहानी, जता दो मुझे क्या कभी सुन सकोगे?
...
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Vinod Pandey
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