फूल तू सम्भल जा Poem by Ratnesh Gandhi

फूल तू सम्भल जा

देख फूल तू खुश् ना होगा
माली का दिल तोड़ के
अपने स्वार्थ के खातिर
चाहे जिससे रिश्ता जोड़ के

अपनी प्यारी बगिया को तू
छोड़ जहाँ भी जायेगा
देखना वहाँ पहुचने पर तू
टूट कर ही जाएगा

याद रहे की तेरा यौवन
जिस खुशबू से निखरता है
उस खुशबू की कद्र सिर्फ
वो माली ही कर सकता है

बगिया से जाने पर तेरा
गुमान नाश हो जायेगा
देखना वो दिलवाला तेरा
खुशबू नाश कर जायेगा

जब नन्ही सी कली बनकर
तू पौधों पर आया होगा
सोच उस वक़्त माली का मन
कितना खिलखिलाया होगा

तेरी उस बचपन से लेकर
खुशबू भरी जवानी तक
माली ने तुझे सींचा है
तेरी इस जवानी तक

ठण्ड धुप बरसात तूफ़ान
आंधी ने जब हिलाया होगा
तब उस माली ने ही तुझपे
खुद का सुरक्षा कवच बनाया होगा

बाहर कीमत खुशबू की लगती
कद्र कहा तेरी शीरत की
अगर कद्र होती शीरत की
तो वर्षा होती अमृत की

तुझको बातों में बहलाना
उनका बना ये जाल है
तेरी बर्बादी का
उनका सबसे बड़ा ये चाल है

झूठी कसम जो खायी होगी
अगर तूने उस भोले माली की
तो फिर तेरे पथ विनाश को
रोक नही सकता मै

सोच समझ ले तू है सयानी
अब कितना समझाऊँ मैं
झूटी तसल्ली देकर
माली को कितना बहलाऊँ मैं

भाई का हक़ अदा अब
ये 'रत्न' पुष्प कर जाता है
वर्ना तेरे तम भविष्य का
प्रभु ही भाग्य विधाता है।
-रत्नेश गाँधी

Saturday, March 19, 2016
Topic(s) of this poem: care,warning
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