आवा विधायक स्वागत बा Poem by sutikshna dubey

आवा विधायक स्वागत बा

जब विधायक जी नई नई जीत प्राप्त करके अपनी कुर्सी की तरफ अग्रसर हुए तो उनकी कुर्सी उनसे कहती है,
आवा बिधायक स्वागत बा,
एतना दिन तक खोब टहरा हा,
थक गा होबा लागत बा।
चार जने अब सलामी नइही,
दुःख तकलीफ हियहीं पे सुनइही,
अब तक सब के तू सोहराया,
वोट बरे तू तेल लगाया,
पाँच साल तक हीलब ना,
हिलाये केकरे ताकत बा,
आवा बिधायक स्वागत बा,
एतना दिन तक खोब टहरा हा,
थक गा होबा लागत बा।
नोटी कै गड्डी चला उठाई,
जन्ता के अँगुरी पे नचाई,
पैसा आगे बरे बचाई,
खा दिन भर तू चैन के रोटी,
बनवा एका महल के कोठी,
विकाश के पैसा खूब चोरावा,
जन्ता कहाँ इ जागत बा,
आवा बिधायक स्वागत,
एतना दिन तक खोब टहरा हा,
थक गा होबा लागत बा।
पाँच साल जब बीति ग एनकर,
आवा जब चुनाव कै दाँव,
कर जोड़ैं ए सबके आगे,
पकड़ै लागेन सबके पाँव,
कहेन कि सबकेउ भैया काका,
सेवा होए जवन कह्य,
हम तो सब के सेवक बाटी
वोट सिरिफ हमही के देह्य।
जन्ता एनकर बड़का बाबू,
कहेस कि चले न एक्कौ जादू,
पैसा देख्या खूब बह्य,
पानी बरे मरत सब बाटेन,
काम एक्कौ इहाँ केह्य,
अौ एतना दिन तू नाइ देखान्या
पाँच साल तक कहाँ रह्या,
अबकी राम करन जी अइही,
सत्ता अबकी एनही पइहीं।
सच में राम करन जी आयेन,
सत्ता सच में वोनही पायेन,
वोनके हाँथे सत्ता अइसे भागत बा,
फिर एनकर गद्दी एनहूँ से बोलेस,
आवा बिधायक स्वागत बा,
एतना दिन तक खोब टहरा हा,
थक गा होबा लागत बा।
एक बार नेतन के सभा में,
ई कानून भा जारी,
जेकर नम्बर आवै सबकेउ,
लूटा बारी बारी।
यहिं खातिर जइ नेता अइही,
अपना सब रंगत के देखइही,
खाइ खाइ जन्तै के सब कुछ,
जन्तै के उपर गोर्रइहीं,
ऐसे लोग से मुक्ती दै देवो,
देश भीख इ माँगत बा,
न अर्जुन रथ पे बैठा बा,
ना कृष्ण रथे कै हाँकत बा,
देश के रीढ़ चरकि जाई का,
हमका ऐसे लागत बा।
आवा विधायक स्वागत बा,
एतना दिन तक खोब टहरा हा,
थक गा होब्या लागत बा।

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
कविता में बिधायक के बारे में व्यंग किया गया है
इसमे जितनें बिधायक आते हैं सब गद्दी के आधीन होकर रह जातें हैं, ऐसा बताया गया है।
और देश के सुधरनें की कामना की गई है।
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