मुर्झाये बसंत Poem by Ratnesh Gandhi

मुर्झाये बसंत

हर साल शीत के बाद
मौसम का नया आगाज़ होता है
फूल खिलते है
बाग़ महक उठते हैं
पंक्षियों का कलरव
मन को सुकून देता है
जिंदगी में हमारे
बसंत खिल उठते है

पर कुछ ऐसे भी हैं
जिनके जिंदगी में
बसंत आता है हर साल
पर वो होते हैं मुरझाए
हमेशा की तरह हर साल

दिन शुरू होता है उनका
दुकानों और ढाबों पे
सड़कों के किनारे कचरों पे
घरो में बर्तनों के बीच
मालिकों के पैरों के नीच
वो बसंत को देखते हैं
पर उनका बसंत होता है
मुरझाए बसंत

वो पढ़ना चाहते हैं
वो बढ़ना चाहते हैं
खिलना चाहते हैं वो
फूलो की तरह
और भर देना चाहतें है
समाज को खुशबू से

पर उनके जिंदगी का बसंत
जाती है मुरझा
कली उनकी खिलने से पहले
जाती है मुरझा

और वो सोचते हैं कि
ख्वाब देखतें है कि
बसंत आएगा
उनके जिंदगी में भी

पर वो भ्रम में जी रहे हैं
प्याला विष का पी रहे हैं
और जिंदगी का उनके
बसंत मुरझा रहा है

'रत्न' की अपील है
आप से दलील है
बसंत इनका लौटना
ये हमारा मुहीम है।
~रत्नेश गाँधी

Sunday, April 17, 2016
Topic(s) of this poem: child
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