हर साल शीत के बाद
मौसम का नया आगाज़ होता है
फूल खिलते है
बाग़ महक उठते हैं
पंक्षियों का कलरव
मन को सुकून देता है
जिंदगी में हमारे
बसंत खिल उठते है
पर कुछ ऐसे भी हैं
जिनके जिंदगी में
बसंत आता है हर साल
पर वो होते हैं मुरझाए
हमेशा की तरह हर साल
दिन शुरू होता है उनका
दुकानों और ढाबों पे
सड़कों के किनारे कचरों पे
घरो में बर्तनों के बीच
मालिकों के पैरों के नीच
वो बसंत को देखते हैं
पर उनका बसंत होता है
मुरझाए बसंत
वो पढ़ना चाहते हैं
वो बढ़ना चाहते हैं
खिलना चाहते हैं वो
फूलो की तरह
और भर देना चाहतें है
समाज को खुशबू से
पर उनके जिंदगी का बसंत
जाती है मुरझा
कली उनकी खिलने से पहले
जाती है मुरझा
और वो सोचते हैं कि
ख्वाब देखतें है कि
बसंत आएगा
उनके जिंदगी में भी
पर वो भ्रम में जी रहे हैं
प्याला विष का पी रहे हैं
और जिंदगी का उनके
बसंत मुरझा रहा है
'रत्न' की अपील है
आप से दलील है
बसंत इनका लौटना
ये हमारा मुहीम है।
~रत्नेश गाँधी
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