Ajay Srivastava

Gold Star - 11,191 Points (28/08/1964 / new delhi)

ज्ञान - Poem by Ajay Srivastava

आपस मे बाट लो ज्ञान
ज्ञान विशवास को कायम करने का
जितना दो उस से अधिक
पा लेने का साधन है 11
ज्ञान सही और गलत मे पहचान करा दे
ज्ञान जाति, समाज मे भेद - भाव
दूर करने मे सक्षम 11
ज्ञान धनी और निरधन दूरी
को हटा आपस मे गले मिला दे 11
ज्ञान प्रगति उन्नति विकास की पर ले चले 11
पर बडे दुख की बात है
अनगिनत लाभ होने के बाबजूद
देश दुलारी जनता और प्यारा जन समुदाय
मुझे (ज्ञान) अपनाता क्यों नही 11
एक जरूर आएगा जब
हम ज्ञान को आपना कर
देश सुनहरे युग मे ले जाएगे 11


Comments about ज्ञान by Ajay Srivastava

There is no comment submitted by members..



Read this poem in other languages

This poem has not been translated into any other language yet.

I would like to translate this poem »

word flags

What do you think this poem is about?



Poem Submitted: Tuesday, February 5, 2013

Poem Edited: Tuesday, February 5, 2013


[Report Error]