नहीं मालूम है मुझको, मुझे किस ओर जाना है Poem by Abhishek Omprakash Mishra

नहीं मालूम है मुझको, मुझे किस ओर जाना है

नहीं मालूम है मुझको, मुझे किस ओर जाना है
कहाँ मंज़िल है अब मेरी, कहाँ मेरा ठिकाना है
है इतनी कशमश दिल में, कि ये भी भूल बैठा मैं
मुझे अब किसका होना है किसे अपना बनाना है

''अपर्णेय ''

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