•• मेरी माँ ••
उससे ही शुरू और उसी पे ख़त्म ये जिंदगी है मेरी
वो कोई और नहीं सिर्फ माँ है मेरी
खुद भूखे रहकर के पहले मुझको खिलाती है
लोरी सुनाकर के मुझको सुलाती है
आती है कोई मुसीबत तो आँचल में छिपा लेती है
वो कोई और नहीं सिर्फ माँ है मेरी
उँगली पकड़कर के जिसने चलना सिखाया
पहला निवाला जिसने मुँह में खिलाया
मुझे चोट लगने पर जिसने आँसू बहाया
वो कोई और नहीं सिर्फ माँ है मेरी
फूलों के जैसा मुलायम उसका दिल है
गंगा के जैसा पवित्र उसका मन है
वो तो भगवान है मेरी
वो कोई और नहीं सिर्फ माँ है मेरी
उससे ही शुरू और उसी पे ख़त्म ये जिंदगी है मेरी
वो कोई और नहीं सिर्फ माँ है मेरी
- रत्नेश गाँधी
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