••बचपन••
काश लौट आतें वो प्यारे
बचपन के दिन मधुर हमारें
पेड़ो पर तो चढ़ना होता
रोज सखन संग बतिया होती
चंदू चाचा के पेड़ो से
अमरूदों की तुड़ाई होती
सुबह शाम हर पहर दोपहर
गाँव में घुमाई होती
पौष माह के शीतलहर में
नहरों में तैराकी करतें
खेतों में अम्मा - बाबा संग
फसलों की रोपाई करतें
काश लौट आतें आतें वो प्यारे
बचपन के दिन मधुर हमारें
सवारी करतें गाय - भैंस की
पूजा करतें जल - थल - नभ की
खेतों में पीली सरसों के
फूलों से हम सजतें - सजातें
स्कूल में जान बुझ कर
मास्टर जी की कुर्सी चुरातें
इम्तिहानो में उत्तीर्ण होकर
घर वालों से आशीष पातें
काश लौट आतें आतें पो प्यारे
बचपन के दिन मधुर हमारें
गर्म लू के ज्येष्ठ माह में
बगिया से अमिया को चुराते
सावन के बरसात में हरदम
कागज की नैया तैरातें
सुबह शाम हर पहर दोपहर
कान्हा बनकर माखन चुरातें
बाबा के संग उपवन में तो
रोज गुलछर्रे उडातें
काश लौट आतें आतें पो प्यारे
बचपन के दिन मधुर हमारे
अम्मा के हाथों की रोटी
सोंधी सोंधी खुशबू देती
दादी - नानी संग रतिया में
जुम्मन - अलगू की कहानी सुनतें
ईंट - गुलेल लेकर के हम
ठाकुर के जामुन को गिरातें
कहीं मिले घायल पंछी तो
मरहम - पट्टी उसे लगातें
काश लौट आतें आतें पो प्यारे
बचपन के दिन मधुर हमारें
काश कभी होता ऐसा कि
जाती घडी घूम पीछे
बंद कर घडी उस समय मै
बचपन में रह जाता पीछे
जब कहीं देखूं नन्हें - मुन्हों को
बचपन की तो याद सताती
त्योहारों पर मिलने वाली
मीठी मिठाईयाँ जी ललचाती
काश लौट आतें आतें वो प्यारे
बचपन के दिन मधुर हमारें
प्रेम नदी की मधुर धारा थी
मेरा वो प्यारा बचपन
सूर्य - चन्द्र की मधुर मिलन थी
मेरा वो प्यारा बचपन
कहें ‘रत्न' अब जी लो भाया
अपना ये प्यारा बचपन
वर्ना पछताओगे तुम जब
उम्र हो जाएगी पचपन
काश लौट आतें आतें पो प्यारे
बचपन के दिन मधुर हमारें
- रत्नेश गाँधी
30-12-2014
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