झुका दे खुद को इतना के Poem by ainan ahmad

झुका दे खुद को इतना के

झुका दे खुद को इतना के
लोग झुक कर तोड़ें फल तेरे टहनी से
बिछा दे ऐसा अपने आप को
के हर क़दम बा-क़दम हो जाए तुझसे
बिखर जा ऐसा फ़िज़ाओं में
के हर सांस को तेरी खुशबू मिल सके
डूबा दे खुद को ज़माने की आगोश इस क़दर
के ज़माना भी तुझे अपना कहने लगे

Wednesday, September 14, 2016
Topic(s) of this poem: life
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