उठ जा ए मुसाफिर, पथ पर चल,
ये काले बादल छँट जाएँगे।
क्या हुआ अगर ये बरस गएँ!
अमृत ही तो बरसाएँगे।
ये आना - जाना बादल का,
ये उठना - गिरना लहरों का,
पूनम और अमावस का,
आना - जाना तो लगा ही रहता है।
चींटी का दीवारों पे,
चढ़ना - गिरना तो लगा ही रहता है।
ऊँची आँधियों में,
ऊँची, आँधियों में,
नीड़ का बिखरना, और, फिर बनना,
लगा ही रहता है।
बस जीव को अपने अंदर,
थोडा सा, धैर्य रखना होता है।
कोयले से हीरा बनना,
आसान नहीं होता।
पर ये भी तो सच है कि,
ये ना कह देने वाला, कोई काम नहीं होता।
ताप सहन करने की बस सामर्थ्य चाहिए,
बादलों से न डरने वाला, बस एक निडर इंसान चाहिए।
जिसने सहा ताप, वो हीरा बनकर आया है,
'रत्न', अब तू भी सह ताप,
तू रत्न बनकर आएगा।
ना घबरा इन बादलों से,
झेल ले इन्हें,
देखना, तू भी अमृत ही पायेगा।
उठ जा ए मुसाफिर, पथ पर चल,
ये काले बादल छँट जाएँगे।
क्या हुआ अगर ये बरस गएँ!
अमृत ही तो बरसाएँगे।
-रत्नेश गाँधी
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem
Excellent bro