उठ जा ए मुसाफिर Poem by Ratnesh Gandhi

उठ जा ए मुसाफिर

उठ जा ए मुसाफिर, पथ पर चल,
ये काले बादल छँट जाएँगे।
क्या हुआ अगर ये बरस गएँ!
अमृत ही तो बरसाएँगे।

ये आना - जाना बादल का,
ये उठना - गिरना लहरों का,
पूनम और अमावस का,
आना - जाना तो लगा ही रहता है।

चींटी का दीवारों पे,
चढ़ना - गिरना तो लगा ही रहता है।
ऊँची आँधियों में,
ऊँची, आँधियों में,
नीड़ का बिखरना, और, फिर बनना,
लगा ही रहता है।
बस जीव को अपने अंदर,
थोडा सा, धैर्य रखना होता है।

कोयले से हीरा बनना,
आसान नहीं होता।
पर ये भी तो सच है कि,
ये ना कह देने वाला, कोई काम नहीं होता।

ताप सहन करने की बस सामर्थ्य चाहिए,
बादलों से न डरने वाला, बस एक निडर इंसान चाहिए।

जिसने सहा ताप, वो हीरा बनकर आया है,
'रत्न', अब तू भी सह ताप,
तू रत्न बनकर आएगा।
ना घबरा इन बादलों से,
झेल ले इन्हें,
देखना, तू भी अमृत ही पायेगा।

उठ जा ए मुसाफिर, पथ पर चल,
ये काले बादल छँट जाएँगे।
क्या हुआ अगर ये बरस गएँ!
अमृत ही तो बरसाएँगे।

-रत्नेश गाँधी

उठ जा ए मुसाफिर
Monday, December 26, 2016
Topic(s) of this poem: motivational
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
हमें अपने राह में आने वाले हर मुसीबतों से घबराना नहीं बल्कि हिम्मत से उनका सामना करना चाहिए ।
COMMENTS OF THE POEM
Ayush Kumar Singh SPIC 31 March 2019

Excellent bro

0 0 Reply
Shipra Singh 05 June 2017

Excellent amazing..... I m the sister of prateek(rohit) ur frnd

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success