मौन परिवेश Poem by Tulsi Shrestha

मौन परिवेश

Rating: 5.0

कविता- मौन परिवेश
मौन परिवेश के अंडर, रोदन एक अवला नारी की
मैं हुँ एक याचक पात्र, दिव्यदृष्टि देनेे वाला धर्मशास्त्र का ।
शांति का प्रतीक सफेद वश्त्र, बना जीवित लाश का प्रतिविब्म
जला हुवा प्रिय के राख के संग, अधूरा हीं रह गया मेरी जीवन ।

अदृश्य बन्धन यह केैसा, मुत्ति का लालच क्यो इतना सस्ती
प्रतिविब्म मैं हु पीड़ा का, बाढ़ मै हु अतृप्त चाहाना का ।
मझदार मे फसी नाउँ मैं, अस्तित्व हरा हुवा नारी मैं
सुगन्ध बिन के फूल मे, दृश्य बिन के नयन मेैं ।

नारी और पुरुष बीच असमानता का, सवल दृष्तान्त मैं
दीमक से सढा हुवा, धर्मशाश्त्र का पन्ना मैं ।
अभिश्राप का प्रतिफल मेैं, अशुभ का प्रतीक भी मैं ।
मातृत्व बिन नारी मैं, मृग तृष्णा का प्रतिविब्म भी मैं ।

अति है गया अति, सहन्न होगा कुण्ठाग्रष्ठ अवधारणाएं यह सब
बिगुल फुगा में, नवः जागरण नारी मुत्ति का अब ।
अस्तित्व मेरी उज्वल भविष्य का, नींव मै खुद रखुगी
प्रतिविब्म मेरी, अपनी होगी, ना बनुगी सााया मै किसीका ।

पुनरागमन होगी वशन्त ॠतु की, यह मैरी जीवन मे
कली खिलेगी हर वृक्ष लता पर, बनकर प्रतीक मेरी आकांक्षाएं का ।
रंग भर दुगी मेैं मेरी आकाश, इद्रधणुष के वरमाला से
मिलेगा सहयात्री मुझे, सवल दर्शन नवः दृष्टिकोण का!

रचनाकारः- -तुल्सी श्रेष्ठ

Sunday, May 7, 2017
Topic(s) of this poem: pain,peace
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 07 May 2017

नवयुग में नवजागरण, सार्थक परिवर्तन व नारी शक्ति को समर्पित यह एक अद्वितीय रचना है जिसमे बदलते समाज का दृश्य उजागर होता है जहां नारी खुदमुख़्तार होगी न कि मूक अनुगामिनी. धन्यवाद, तुलसी जी.

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success