अंधकार में बिलिन, एक अस्तित्व हूँ मैं
हर शब्द जो मैं ने लिखी
सागर की गहराई से निकली ।
बहती हुई आँसू की हर बूँद पर
प्रतिबिम्ब बनी, मेरी वेदना का ।
जीवन की हर मोड़ पर
गिरी हूँ मैं ठोकर खाकर ।
भय ओैर पीड़ा का संगम
प्रतिरुप बना, मेरी जीवन का ।
कैद कर ना सकी, कभी मैं ने
आशा के, किसी भी पल को ।
खुद की सूरत कभी, ना देखी मेैं ने
अंधकार में बिलिन, एक अस्तित्व हूँ मैं ।
रोशनी से, कभी पूछ ना सकि मै ने
प्रभात, बना क्या चिज का ।
हवा के हर झोके के अलावा
कोई मीत ना बनी मेरी ।
मै हूँ अभिशापित यौवन-कली
जो खिलने से, पहले बिखरी ।
प्यासी हूँ मैं, हर प्यार की बूँद का
ना बनी अबतक, कोई मेरी अपना ।
किस्मत से मारी, दृष्टिहीन नारी
स्पर्श अनुभूति हीं, सबकुछ मेरी ।
उपेक्षित बनी मैं सब के नजर में, हे खुदा
ना कर गरुर तू खुद से, देख मैं तेरी हीं रचना हूँ ।
रचनाकारः- तुल्सी श्रेष्ठ
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