तेरे बिन सजनी, मैं जिऊ कैसे
तेरे बिन सजनी, मैं जिऊ कैसे
तू चली, मेरे अरमान लेकर, तेरी संग ।
न जाग सका, न रातभर सो सका मैं
तनहा ओैर गम छोड़ के, खुशी जो ले गयी तू ।
दीप ज्योति जो था, मेरे अंडर
बुझ गया, काले बादल के संग ।
ये हम सफर, सांया तू मेरे जिस्म का
तू छोड़ के मुझे कहाँ चली ।
आँगन मेरा सुना, जग सुना
सभी फूल भी मुरझा गए, बागियान सुना
धडकण जाे थी तू उन सबका ।
जीवन की महक जो था, तू जो ले चली
दिल की गली में, सरगम बजना बन्द हो गयी ।
सम्भलता नहीं य दिल, तेरी बिन प्रिय
चाँद, सितारे, मेरी पूजा की प्रतिफल जो थी तू ।
रहा नहीं जाता, अब तू बिन एक पल
पतझड छोड़ के, तुम ने बसंन्त ले चली ।
सावन रुथी, सुखी दिल की नदिया
केेैसा य जीवन की दस्तूर ।
समय के साथ अपनो ने हीं, भूला दि तुम को
जैसे की तू , उन लोगो का कुछ लगता हीं नहीं ।
पर सजनी, तू सुन मुझ को,
अकेले हम हैं तुम्हारे, हम हैं तुम्हारे ।
कैसे भूला दू मैं, अपनी सासों की खुशबू को ।
तेरी साथ जो बिताए, वो प्यार भरी उन लम्हे को
तुझ बिन मेेेैं ऐसे डूबा, डूब के फिर तेेैर न सका ।
ख़त तो मेैं ने, लिखा था तुम को, प्रिय
दिन और रात में कितनी बार, सजनी ।
आ जा तू मुझे ले ने, मेरी मेहबूबा
रहा नहीं जाता, अब तू बिन एक पल ।
रहा नहीं जाता, अब तू बिन एक पल ।
रचनाकारः—तुल्सी श्रेष्ठ
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