सन्नाटा के बीच मौत की आहट Poem by Tulsi Shrestha

सन्नाटा के बीच मौत की आहट

सन्नाटा के बीच मौत की आहट
हर जगह, हरपल ताण्डव नृत्य मौतका
ना कभी देखा, ना कभी सुना
ऐसा संत्रास और दसहत का
भयावह माहौल जगत का ।
जगह नही रहा कब्रिस्तान में
शवों दफनाने के लिए ।
ईश्वर, अल्लाह, प्रभू
पुकारने वाले हर आदमी के
मुह पर अब तो
कोरोना के अलावा
कहने के लिए, कुछ नही रहा ।
देखो कांप गई ये धरती
"कोरोना" ध्वनी की कम्पन से ।
मौत का ख़ोफ़ से
दिल हिल गया सब का ।
सदा प्रभू स्तुति में
खोने वाले आम आदमी से
लेकर किसी से ना डरने वाला
तानाशाह सब, अब तो
हो सके तो, संम्भब हो तो
छिपना चाहते है जमीन के नीचे ।
खुद को धरती की मालिक
समझकर मानव तू ने
विनाश कर दिया प्रकृति का ।
अपने महत्वकांक्षा और स्वार्थ
के खातिर तुमने तो
जलचर, थलचर और गगनचर का
छिना था, बासस्थान और आहार भी।
अपने अस्तित्व बचाने के लिए
तुम्हे दुसरो का अस्तित्व भी
स्वीकारना होगा, स्वीकारना होगा ।
यही प्रकृति का शाश्वत नियम हैं ।
देख तू अब ' माहौल बदल गया
सपनो की शहर को
सुनसान कब्रिस्तान और
शमशान घाट समझकर
वन्य जीव दिखाई देने लगा
तेरे घर के चौखट पर ।

रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
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Friday, May 1, 2020
Topic(s) of this poem: death,grief
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