चुन लक्ष्य अपना, ऐ मानव,
मंज़िल को तुम कूच करो।
ना मिले यदि तुम्हें पथ कोई,
तो खुद पथ का निर्माण करो।
तूफाँ, बारिश, सागर - चट्टान,
आएँगे विध्न यहाँ हज़ार।
तुम डरना मत उन विध्नों से,
लड़ पड़ना तुम उन विध्नों से।
हर कदम पे अपनी पहचान करो,
इस को पिछले से ख़ास करो।
ना लगे तुम्हें वो पथ सही,
तो नए पथ का निर्माण करो।
पथ बदलो पर तुम्हें याद रहे,
कि लक्ष्य तुम्हारा वही रहे।
इस जीवन के आवा-जाही में,
हर कदम तुम्हारा सही रहे!
सही दिशा-बोध और मन-संयम,
हृदय-साहस लेकर बढ़े चलो।
माना कि मंज़िल दूर सही,
तुम लक्ष्य पे अपने अटल रहो।
कर मंज़िल अपना तुम फतह,
परचम जब लाहराओगे।
वो खुशी तुम्हें जो 'रत्न' मिलेगी,
उससे तुम हर्षओगे।
चुन लक्ष्य अपना, ऐ मानव,
तुम लक्ष्य पे अपने अटल रहो।।
-रत्नेश गाँधी™
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem