मौत Poem by mayank rakesh

मौत

उस उलझन को आज फिरसुल्झाता हूँ
जो मैं नही समझा तुमको समझाता हूँ ||
मोत अंत नही ये शुरुआत है
ये तो ग्रीष्म के बाद आने वाली बरसात है ||
की मौत एक सुलझीहुई उलझी पहेली है
जो जी नाही पाया उसको भी आनि है
जो मर नई पाया उसकी बी जानी है ||

Monday, July 30, 2018
Topic(s) of this poem: death
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