समर्पण
प्रियतम, मैं तुझमे खोना चाहती हू ।
मदहोश होके तेरा अण्डर रमाना चाहती हूं ।
स्वच्छन्दता नहीं में तेरा संरक्षण चाहती हूं ।
समर्पण में हीं मुझे जीवन की आभास मिलेगी ।
मैं तेरा जीवन की अघूरापन को पूर्णता दुगी ।
अर्धागिंनी बनकर हरपल मैं तुझे प्रेरणा दुगी ।
तेरा प्यास मिताने के लिए सुख की मूलघार बनुगी ।
अछूता प्यार देने के लिए हिम नदी बनकर बहूगी ।
दुख के हरपल मैं भी, मैं तेरा हीं साथ रहूगी ।
जीतकर नहीं हारकर भी, मैं तुझे पाऊगी ।
मेरी आंचल के नीचे तुझे स्वर्ग मिलेगा ।
मेरी अघर की मुस्कान तुझे नश जीवन देगा ।
मेरी अस्तित्व तुझमे समाके नव कली खिलेगा ।
सृस्टि के क्रम जारी रहने से परम ब्रह्म रमेगा ।
रचनाकार: -*तुल्सी श्रैष्ठ
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