तू हीं मेरी सूरजमुखी
चांद निकल पडा दिन में हीं ।
सूरज देव डुबने से पहले ।
आतुर है दोनो कितने
तेरी हुस्न के मादकता निहारने ।
नितम्ब चुमते तेरी जुल्फे
काली घटा की बिम्ब बनी ।
बहकते चंचल पवन ने
अविरल वर्षा की उदघोष कि ।
तेरी चरण की पदचाप चूमने
जल तरंग निकला सागर से ।
झुक गया आसामा भी
त्याग के अभिमान तेरे लिए ।
तेरी अश्क की प्रतीक बनी
सव सागर की नमकिन पानी ।
तेरी चंचलता की बिम्ब बना
कलकलाती नदी की धारा ।
आरधना मैं तेरी करता हूं
बनके पुजारी तेरी हुस्न का ।
खिलेगा नव कली, एक और जीवन
प्रतीक बनेगा हम्हारा प्रेम का ।
मनमोहक बना तेरी गुलाबी चेहरा
जब गालो में पड़े, गहरे भंवर
रिसते हुए दो तेरी अधर
मधुकुण्ड बना मेरा चुम्बन का ।
रचनाकार: --तुल्सी श्रैष्ठ
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