आखिरी सांस की दुआ
आखिरी सांस रुक-रुककर
पुकार रही अपनी प्यार को
आजा तू, अब तो!
जिए क्यो ऐसी जिंदगी
जो मौत के लिए
हर पल व तरसे ।
भले, मोहब्बत न सहीं
नफरत की काबिल तो
समझो, तू मुझको ।
इक पल हंसी के लिए
दर्दे यह दिल, बहुत तड़पे
और तू महफ़िल मे झुमे ।
मदहोशी तेरी कदम को
चुमा दौलत ने जबसे
अजनबी बनी, तू तबसे ।
एहसानमंद हूंमैं तन्हाई का
हर पल साथ निभाया
मरते दम तक उसने ।
बहार कभी नही आया मेरे जीवन में
बगिया सब उज़ड गए मेरे
मुरझाए फूल खिलने से पहले ।
गम का प्याला जो तू ने पिलाया
बोल तू खुद,हे मेरी प्रियतम
दवा कहाँ , उस जहर का यहाँ ।
अश्क के समंदर में डूबा मैं
किनार निकली, तू अकेली
मगर इल्जाम मुझपे लगाली ।
साया बनकर तू, मेरे साथ चली
फिर शैाहरत के पिछे ऐसी भागी
जैसे दौलत कभी, देखा हीं नहीं ।
जमीर बेचकर, जो खरीदा तुमने
लगाया दाग, स्वच्छ दामन में
मेरे आंसू से, तू उसे धोना ।
हे खुदा, यह क्या हूआ
बेवफा व निकली
बेबस मैं बना ।
लबों से निकली फरियाद मेरी
दुआ मेरी आखिरी सांस की
तू खुश रहे जहाँ भी रहे ।
याद तुझे मेरा, कभी न आए
खुदा की दुआएं तुझे सदा मिले
तू हर पल सलामत रहे
यहीं आखिरी ख्वाहिश मेरी ।
रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
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2018 November 1..10.45 AM
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