पिघलता सूरज
हर दिन, हर पल, हर जगह
ढूढता सूरज अपनी सजनी को ।
डरकर छिपी थी चांदनी
भिमकाय पर्वत के पीछे
कहीं प्यार के आगोश मे
जलकर खुद राख ना हो!
बेहद धके हारे, उतरा निचे
पिघलता, निराश सूरज ।
मां के आंचल की छाव मे
छिपकर सिसकने लगा सूरज ।
देख ना पाई सागर, पीड़ा बेटे का ।
सुनकर दोनो का रोदन को
रोकन पाया खुद को आसमां भी
रसकर अखियां लाल बना उनका ।
धिरे धिरे से निकल पड़ी चांदनी
अपनी साजन को देखने को ।
सितारे झुमकर नाचने लगा
मुस्कुराने लगी शितल रोशनी ।
क्षितिज जगमगाया सुनसान रात मे
मगर चांदनी थाम न सकी दर्द दिल की ।
डूबते निराश सूरज को देखकर
चांदनी खुद को सम्भालना ना पाई ।
अविरल नयनों से अश्क बहकर
बनके वर्षा, टपक पड़ा सूरज के सीने पर ।
अनयास! सूरज चौक उठा तंद्रा मे
चांदनी चांदनी चिल्लाते
उपर उगा सूरज सागर से।
डरकर अंधेरा भागा
सूरज के पदचाप सुनकर ।
आंधियां बनकर सागर उठी
मत जा छोडकर बेटे हम्हे
रो रो के सागर बोली।
लेकिन सूरज पहुँचा उनसे
बहुत दूर, बहुत दूर...., , ....।
नित्य यहीं क्रम चलता रहा
हर दिन चांदनी छूपती रहीं
छुपती रहीं, छुपती रहीं अपनी हीं साजन से ।
रचनाकारः- तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
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