ऐसा भी एक दशहरा Poem by Tulsi Shrestha

ऐसा भी एक दशहरा

ऐसा भी एक दशहरा

सब चेेेैन से सो रहे हैं
जेैसे कुछ हुआ हीं नहीं ।
भला कोइ मरे या जिय
यहाँ किसी को क्या लेना देना ।
सदगत की राख की ढेर में
मैं मानवता के अवशेष ढूढता रहा ।

हा मैं उन लोगों में से एक
अभागन, बेकसूर और बेवकूफ
जिसे रावण बनी ट्रेन ने रौद दाला ।
दशहरा के रौनक थी हींं ऐसा
ख़ुद को मैं रोक न पाया ।

रावण का पुतला जब दहन हुआ
पटाखाें की बौछर से बचने के लिए
चढ़ा मेैं औरों के साथ....
दीवार उपर बना रेल पटरी पर ।
टीबी पर्दा जो था सामने
मग्न होकर हम सब देखने लगा ।

अनायास तीब्र गति से आाया इक ट्रेन
हम सब को रौदकर चला गया ।
औरों के साथ मेरा भी
कट गया जिस्म हमारा
शिर कहीं,तो धड़ कहीं ।
रगं गई धरती भत्तोजनो की खून से ।

क्षणभर में मेला बना
लाशों से भरी शमसान ।
बचा घायलों की चित्कार से
काली आकाश भी रो पडी ।
उत्सव त्योहार का बना
दुखद माहौल हादेसा का।

राजनीति की रंग ने हम्हे
दो बार फिर से मारा ।
हम लोगों ने खो दी जीवन
अज्ञानता और अंधआस्था के कारण ।
" किस ने कहा तुम लोगों को
रेल पटरी में खड़े होने को "

कर्म के फल सेप्रेरित ये वाक्य
चुभता हम्हारे दर्द दिलको ।
सहानुभूति की लायक भी अब
हम में से कोई न रहा ।
बोलू मैं तुम सब को
हम भी हैं मानव,क़ीड़ाें मकोड़ों तो नहीं ।

एक दुसरो के आरोप- प्रत्यारोप में
दुनिया येसे डूबा, येसेे डुबा
जलती चितावों का रोदन भी
न सुना दी, ये दुनिया को!
ना बाबा ना, दोष मत किसी को देना
उपर आने का वक्त, मालुम होगा दोष किसका ।

दुसरा जनम मिलेतो यारों
दशहरा देखने कभी ना जाउँगा ।
फिर भी मुझे जलाना हैं रावण को
लेकिन वो पुतला र्निजीव रावण नहीं
वो हैं, मेरे अंडर छिपा सजीव रावण ।
जो अपने स्वार्ध के लिए
औरों का लाशों में भी अपना भविश्य ढूढता ।

आंसूओं की बूंदे समेटकर रची गई रचना
सर्जक ः- -तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
@copyright reserved
2018...October 22...5.45 PM

Tuesday, March 19, 2019
Topic(s) of this poem: death,tulsi
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