अन्तहिन यात्रा Poem by Tulsi Shrestha

अन्तहिन यात्रा

अन्तहिन यात्रा
मैं गुजरा हुआ कल का
एक हिस्सा हूँ ।
मेरा कोई अस्तित्व नहीं
फक़त एक अहसास हूँ।
कोई कलंकित कर देती मुझे
कोई गौरवान्वित
उपज हैं यह अन्तर
दृष्टिकोण सब का ।
अबसान हो गया
तेरा और मेरा का
अर्थी उठा मृगतृष्णा का
टूटा बन्धन माया का
सब सोया तो मैं जागा नींद से
शून्य केतट पर मुझे
बिल्कुल अकेला
अन्तहिन यात्रा करना हैं ।
बन गया मै अब
बीता हुआ कल का किस्सा ।
अस्तित्व खोकर मैं बना
गुजरा हुआ समय का
एक हिस्सा, एक अनुभूति।

रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
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Saturday, March 30, 2019
Topic(s) of this poem: journey,tulsi
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