जब जब मैं दर्पण देखूं Poem by Tulsi Shrestha

जब जब मैं दर्पण देखूं

जब जब मेेैं दर्पण देखूं
मेरे जगह तुझे देखूं ।
खुद को खोकर
मैं तुझे पालूं।
हर कण और हर बीज पर
तेरा हीं प्रतिबिंब मैं देखूं ।
हवा के हर झोके पर
तेरा खुशबू, मुझे मिले ।
हर शब्द की ध्वनि पर
आभास तेरा, मुझे मिले ।
प्यार के परिभाषा
मैं क्याे दूअब ।
उदगम जो तू हींहेेेैं
हर प्यार के पल का ।
जीवन को जो सांस मिले
दिल को जो धड़कन मिले
तेरा हीं अनुकम्पा तो हैं ।
जग की हर प्राणी को
विलीन तो होना पडेगा हीं
आखिर एक दिन, तुझमें हीं ।
विसर्जन मेैं करता हू
ये मेरे जीवन
तुझे हीं पाने को ।

रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
@copyright reserved
2018...December 19....4.55 PM

Saturday, March 30, 2019
Topic(s) of this poem: mirror,tulsi
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