एक पागल ऐसा भी Poem by Tulsi Shrestha

एक पागल ऐसा भी

एक पागल ऐसा भी
भावना की दर्पण पर
जब देखता हूँ मैं
ख़ुद एक पागल सा
नजर आता मुझे।

एक पल एकांत मिले तो
ख़ुद से बाते करने लगता हूँ ।
शब्दो में सुवास ढुढने वाला मैं
इसे दुर्गन्धित करने में भी माहिर हूँ ।

मृत शब्दों में धड़कन
अनुभूति करने वाला शख्स
पागल कवि नहीं तो और क्या हेैं
निसंदेह मेेैं पागल प्रेमी, शब्दों का ।

मृत्यु से ना डरने वाला
मैं पागल, शब्दों का भूखा
ख़ुद को शाश्वत सत्य का
रचयिता समझता हूँ।

मेरे रचना को कोइ
वाह...करते तो
ख़ुद को सूरज समझने का मेैं
दुस्साहस करता हूँ।

कपो कल्पित मेरा सिंहासन
मेरे पुत्र पुत्री, पोता पोती को
विरासत में मिले
मैं ये चाहाता हूँ ।

दिल के अंडर छिपा
अनोखा अंतरव्दंद ने
इस नादान को
पागल कवि बना दाला ।

कोइ मुझे तिरस्कार करे तेा
मेैं खुदा को कोसता हूँ
अनुपम खुदा का रचना होकर भी
रेगती कीड़ा जेै- सी जी रहा हूँ मैं ।

रचनाकारः- - तुल्सी श्रेष्ठ
By Tulsi Shrestha
@copyright reserved
2018....October 17....12.17 PM

Sunday, March 31, 2019
Topic(s) of this poem: insanity,tulsi
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success