याद दिला दूँ तुम्हे आज, मैं वहीं हूँ Poem by Tulsi Shrestha

याद दिला दूँ तुम्हे आज, मैं वहीं हूँ

(हो सके तो पढना इसे, इसके अलाबा क्या कहूँ तुझे)
याद दिला दूँ तुम्हे आज, में वहीं हूँ

खुद को मिटाकर, तुझे किसी ने पेहचान दि
तेरी नमी आँखों को मुस्कान, उसी ने दि ।
तेरी लडखडाती आहट को सरगम दि
तेरी आवाज को गीतों से भर दि ।
तेरी सासों को खुशबू से भर दि।
याद दिला दूँ तुम्हे आज, में वहीं हूँ।

जब नदि से तु सागर बनी
पानी ने अपना मिठास खो दि।
तुझे जब मंजिल मिला,
तु ने अपनों को हीं भूला दी।
तेरी समृध्दि से झुसला इक शव
याद दिला दूँ तुम्हे आज, में वहीं हूँ।

तु एक बूँद पानी के लिए तरसती थी
आज तू खुद बरसती मेघा बनी ।
जो वाटिका मे तु कली बनकर खिली
उन को किसी ने अपनी लहू हीं सींचा था ।
तेरी दिल की, .रिश्ता किसी की धड़कण से था
याद दिला दूँ तुम्हे आज, में वहीं हूँ ..............।

चरचराती तेरी घाव को,
मलहम बनकर किसी ने ठण्डक दि ।
तु तो मझधार मे फसिं थी
कश्ती बनकर किसी ने तुझे नव जीवन दि ।
तेरी दामन को खुशी से भर दिया था किसी ने
याद दिला दूँ तुम्हे आज, में वहीं हूँ.........।

गुमराही थी तू, जब सूरज के किरणों ने
तरस खाकर नहला दि तुझ को
तु खुद को सूरज समझने लगी।
सुन तू, कभी सूरज ने चाँद की औकात याद दिलाया था ।
तेरी जीवन के दहलीज पर मौत जब दस्तक देगा
एहसास होगी जरुर, , मेरा प्यार का तब तुझे....।

रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
@copyright reserved

Sunday, March 31, 2019
Topic(s) of this poem: tulsi
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success