मतिभ्रम कहूँ या दृष्टिभ्रम Poem by Tulsi Shrestha

मतिभ्रम कहूँ या दृष्टिभ्रम

मतिभ्रम कहूँ या दृष्टिभ्रम
तू क्यो उगता नहीं
उस जगह से
जहाँ तू सदा डुबते हैं।
रातभर में सोई नहीं
तेरा इन्तजार करती रहीं
लेकिन तू उगा, बिल्कुल
दुसरी जगह से।
कायल होगई मैं, अब तो
हर दिन नई कली से
खेलने का तेरा आदत से ।
एहसास कब होगा, बोल तू
मेरी सच्चे प्यार महक तुम को ।
मेरी दिल कि धड़कण
मैं ने तुझे सौपी थी ।
तुने तो मेरी अरमानों का हीं
चिता जलादि ।
सब कि नजर मे
तू उगता सूरज
मेरी बजह से
तू कलंकित ना हो ।
जनाजा जब उठेगी मेरी
कन्धा देने तू जरुर आना
मत चाढ़ाना फूल
मेरी कब्रपर तू
दो बूद आंसू बचा के रखना
सौगात के तौरपर तू
मेरी लाशपर हीं सहीं ।
राहू और केतु बनकर मै
हर साल तुझे
तेरा फरेब का एहसास
दिलाती रहुगी ।

रचनाकार - - तुल्सी श्रेष्ठ
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