तेरी हुस्न ने बनादि दिवाना मुझको Poem by Tulsi Shrestha

तेरी हुस्न ने बनादि दिवाना मुझको

तेरी हुस्न ने बनादि दिवाना मुझको
खूबसूरती ढूंढने में, और इसे पाने में
जीवन बीत जाता, इसकी छाव में ।
वक़्त ठहर गया कुछ पल
मुड़ कर तुझे देखने के लिए ।
बारिश मे भीगते तो
सब को देखा मैंने ।
पर सूरज की रोशनी से
नहला जिस्म को देखा आज ।
होठों की कंम्पन से निकली
आवाज तो सब ने सुना होगा ।
मैंने तो हुस्न की बोलती
निशब्द आँखें भी देखा हैं ।
तेरी खूवसूती होठों की गर्मी से
पाषाण को भी पिधलते देखा ।
तेरी यौवन की भार से
धरती डगमगाते देखा मैंने ।
ये तू ही तो धी ना, जिसने
शाय काल की आसमान को
चुम चुमके लाल बना दि!
आशिक तो था हीं मैं
दिवाना बना तेरी प्यार मेंं ।
चंचल मचलती ये नदियां
सिखने लगा तेरी मादक चाल ।
खूसबू मिला फूलों को
तेरी मादक देह से ।
लहराना सिखी थी नागीन ने
लहराती तेरी जुल्फोंं देखकर ।
ना ना तू बिम्ब नहीं किसी का
तू खूद प्रतीक हैं सब का।
देख खुदा तू, तेरी हीं रचना
तुझसे अधिक, प्रिय केैसे बना ।
दिल ने भी कभी धड़कन से पूछा था ।
तू तो मेरा उपज हैं, फिर भी सब
ढूंढता तो तुझे हीं ना ।
सुनकर ये बाते, जब तू रो पड़ी
गिरकर कुछ बूंद तेरी नयनों से
ये क्या य तो सागर बना!

रचनाकार: - -तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
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Sunday, March 31, 2019
Topic(s) of this poem: beauty,insanity,tulsi
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