तेरी हुस्न ने बनादि दिवाना मुझको
खूबसूरती ढूंढने में, और इसे पाने में
जीवन बीत जाता, इसकी छाव में ।
वक़्त ठहर गया कुछ पल
मुड़ कर तुझे देखने के लिए ।
बारिश मे भीगते तो
सब को देखा मैंने ।
पर सूरज की रोशनी से
नहला जिस्म को देखा आज ।
होठों की कंम्पन से निकली
आवाज तो सब ने सुना होगा ।
मैंने तो हुस्न की बोलती
निशब्द आँखें भी देखा हैं ।
तेरी खूवसूती होठों की गर्मी से
पाषाण को भी पिधलते देखा ।
तेरी यौवन की भार से
धरती डगमगाते देखा मैंने ।
ये तू ही तो धी ना, जिसने
शाय काल की आसमान को
चुम चुमके लाल बना दि!
आशिक तो था हीं मैं
दिवाना बना तेरी प्यार मेंं ।
चंचल मचलती ये नदियां
सिखने लगा तेरी मादक चाल ।
खूसबू मिला फूलों को
तेरी मादक देह से ।
लहराना सिखी थी नागीन ने
लहराती तेरी जुल्फोंं देखकर ।
ना ना तू बिम्ब नहीं किसी का
तू खूद प्रतीक हैं सब का।
देख खुदा तू, तेरी हीं रचना
तुझसे अधिक, प्रिय केैसे बना ।
दिल ने भी कभी धड़कन से पूछा था ।
तू तो मेरा उपज हैं, फिर भी सब
ढूंढता तो तुझे हीं ना ।
सुनकर ये बाते, जब तू रो पड़ी
गिरकर कुछ बूंद तेरी नयनों से
ये क्या य तो सागर बना!
रचनाकार: - -तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
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