काश पीड़ा को, कुछ कहने की इजाजत होता
आमंत्रित किया गया मैं
इक गरिमामय कवि गोष्ठि में।
अस्वस्थ होने पर भी मैं
प्रफुल्ल होकर पहुंचा मेेैं ।
विशेष अतिथि के रुप में
अपना शिष्य देखकर
छाती चौदा होगया गर्व से ।
उनकी ब्यत्तित्व की ओज में
उगती सूरज का आभास हमे मिला ।
शालिन मूद्रा मे हम सब कि ओर बढा
पदिय मर्यादा के लिए मैं खड़ा होकर
विनम्र अभिवादन किया ।
मुझे कुछ प्रतिउत्तर ना मिला ।
वह आत्मीयता से, दसूरों से गले मिला ।
मैं स्तब्ध होगया, होठों कांप गया
वह दोबारा फिर वापस आगया ।
मेरे पीछे पंति मे बैठे लोगो से
हाथ बढाकर गरम जोश से मिला ।
मेरे बूढे हड्डी मे ज्यान न था
फिर भी मेैंने उनकी पदीय गरिमा के लिए
पुनः खडे होकर अभिवादन की ।
हेय के दृष्टि से देखकर मुझे
वह देश का शासक आगे बढा ।
मेरे आंखो से दो बूढ आंसू
चेहेरे पर लुढ़क गया ।
काश पीडा को कहने का
कुछ इजाजत होता ।
समय का साथ सब बदलता
इन्सानियत का परिभाषा भी ।
अपना हीं लाभ की पथपर चलना
रीत हैं यह खुदगर्ज दुनिया का ।
रचनाकार- तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
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