आमंत्रित किया गया मैं Poem by Tulsi Shrestha

आमंत्रित किया गया मैं

काश पीड़ा को, कुछ कहने की इजाजत होता

आमंत्रित किया गया मैं
इक गरिमामय कवि गोष्ठि में।
अस्वस्थ होने पर भी मैं
प्रफुल्ल होकर पहुंचा मेेैं ।
विशेष अतिथि के रुप में
अपना शिष्य देखकर
छाती चौदा होगया गर्व से ।
उनकी ब्यत्तित्व की ओज में
उगती सूरज का आभास हमे मिला ।
शालिन मूद्रा मे हम सब कि ओर बढा
पदिय मर्यादा के लिए मैं खड़ा होकर
विनम्र अभिवादन किया ।
मुझे कुछ प्रतिउत्तर ना मिला ।
वह आत्मीयता से, दसूरों से गले मिला ।
मैं स्तब्ध होगया, होठों कांप गया
वह दोबारा फिर वापस आगया ।
मेरे पीछे पंति मे बैठे लोगो से
हाथ बढाकर गरम जोश से मिला ।
मेरे बूढे हड्डी मे ज्यान न था
फिर भी मेैंने उनकी पदीय गरिमा के लिए
पुनः खडे होकर अभिवादन की ।
हेय के दृष्टि से देखकर मुझे
वह देश का शासक आगे बढा ।
मेरे आंखो से दो बूढ आंसू
चेहेरे पर लुढ़क गया ।
काश पीडा को कहने का
कुछ इजाजत होता ।
समय का साथ सब बदलता
इन्सानियत का परिभाषा भी ।
अपना हीं लाभ की पथपर चलना
रीत हैं यह खुदगर्ज दुनिया का ।

रचनाकार- तुल्सी श्रेष्ठ
Composed by Tulsi Shrestha
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Sunday, March 31, 2019
Topic(s) of this poem: pain,tulsi
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