अमरत्व
अमरत्व मुझें जरुर मिला
मेरे अवसान के वाद ।
गुंज गइ मेरे कवितिएं
दिल की हर धड़कन में
हा जरुर, मेरे जाने के बाद ।
जब में दर्द से कराहा रहा
आखिरी सास गिन रहा
सासो से जीवन का नाता
टूटने का समय हुआ।
अलविदा जिन्हें कहना हो कहो तू
समय वहुत कम है अभी
मौत ने धिमी आवाज में
मुझसे वार वार कहा ।
चाहकर भी किसी को
कुछ नहीं कह सका
क्युकी, दिवार के अलावा
वहा कोई नही, मिला
न अपना, न पराया।
हालचाल पुछने कि जरुरत
किसिने ना देखा होगा
मौत के वाद नाटक का
मंचन तो होना हीं था
सो हो गया...
आंसू कि नदिया बहा
अखवार मेंं तसवीरें छपि ।
जिस प्यार के लिए मैं
हरपल तसता रहा, वह तो
मेरे मौत के वाद मिला, मुझे ।
जीतेजी अनुभूति कर न सका
मरने के वाद, खाक करू ।
जलना तो हैं मुझे दोबारा
जिंदा था तो चिंन्ता ने जला दि
अबकी बार हैं, चिता में जलने का ।
मत जिलाना अब मुझे
अमर नहीं बनना मुझे
मरने के वाद ।
रचनाकारः - -तुल्सी श्रेष्ठ
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem