मेरा कोई पहेचान नहीं
लाचार, हाराहुआ
गन्तब्यहीन एक अस्तित्व
अन्धकार के गर्भ के अन्डर
खुद को ढुढता रहा
जिसका अपना रोशनी नहीं
अपने आप को सूरज समझता रहा
जब अपनेही परछाई ने
पहचान ने को इन्कार किया
तब जाकर औकता मेरा
मालुम हुआ
जगमगाते तारों बीच मैं अकेला
ना कोहीं रौशनी, ना कोई नाम
ना कोइ पहेचान
लफ़्जो के सहारे मन बहलाता रहा
जिने का बहाना रचता रहा
मै कौन हुँ ना बतलाय
तो बेहतर हैं ।
रचनाकरः——तुल्सी श्रैष्ठ
by Tulsi Shrestha
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