Shashikant Nishant Sharma

Rookie - 133 Points (03 September,1988 / Sonepur, Saran, Bihar, India)

हर शाम जो मेरे ख्वाबों में आती है सताती है - Poem by Shashikant Nishant Sharma

हर शाम जो मेरे ख्वाबों में आती है सताती है
सुबह बदली बदली अजनबी सी क्यों लगती है
ये कैसी चाहत ये कैसी हसरत है
जाने कैसे ये हमारी मोह्हबत है
न जाने हम न समझे वो
क्यों वो मेरे दिल की जरूरत है
है उसकी अदा तो सबसे जुदा
दिल उसपे फ़िदा जाने क्या जादू करती है
हर शाम जो...

हाले दिल बया करने से क्यों मेरा दिल डरता है
रूठ न जाये फिर से वो किस्मत की तरह
नाजुक है वो फूलो सी दिल छूने से भी डरता है
कही टूट न जाये ख्वाबों की ईमारत की तरह
बड़े जतन से दिल उसे दिल में ही रखता है
न वो कुछ कहती न कुछ बतलाती है
हर शाम जो...

है हसरत की फुर्सत में कभी
मिल जाये वो कहीं किताबों की तरह
वो खुश रहे ख्वाहिश है अभी
वो जहा रहे खिलती रहे गुलाबों की तरह
है ये कैसी कशमकश हम कहे भी तो क्या कहे
वो पास ही रहती है मगर दूर क्यों लगती है
हर शाम जो...

{Written during my study of Bachelor of Planning at School of Planning and Architecture, New Delhi in 20011...Dedicated to a girl of my class.}


Poet's Notes about The Poem

Written during my study of Bachelor of Planning at School of Planning and Architecture, New Delhi in 20011...Dedicated to a girl of my class.

Comments about हर शाम जो मेरे ख्वाबों में आती है सताती है by Shashikant Nishant Sharma

  • (4/16/2012 12:43:00 PM)


    a philosophy of love as philosophy....it reflects the image of virtual love without WASANA]]] (Report) Reply

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Poem Submitted: Monday, April 16, 2012

Poem Edited: Monday, April 16, 2012


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