दो वक्त के खाने का तकाजा हे घर मे मेरे,
फिर क्यों जमाना मुझसे मेरी दोलत पूछता है।
उसके प्यार का सलीका भी अजब निकला,
वो आज भी मुझसे मेरी सोहरत पूछता है।
इजहार करने कई लिए हर पल खास है,
डरता है दिल साधु से मोहरत पूछता है।
जब से मेने कहा उसे तू मेरा खुदा है,
तबसे वो रातो को मेरी इबादत पूछता है।
जब से तू है अमीरों मे अपना वजूद है,
बिन तेरे खुद ये मुफलिस अपनी हेसियत पूछता है।
बेटे को बाप से बड़े होने का जब से अहसास हुआ,
तब से वो माँ से अपनी वसीयत पूछता है।
जिसने दिए मुझे ज़ख्म सबसे गहरे,
कमाल हे आज वही मुझसे मेरी खेरियत पूछता है।
हर सांसो की जब गिनती चलती है पाचाल
फिर क्यॊ जिस्त मोत से मोहलत पूछता हे।
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