गुनाहों का देवता तालीम मोहब्बत की देता हे Poem by Nageshwar Panchal

गुनाहों का देवता तालीम मोहब्बत की देता हे

समझ ना पाओगे परदे का खेल तुम
गुनाहों का देवता तालीम मोहब्बत की देता हे |
वो चेहरा ऐसा नहीं हे जैसा नजर आता हे
काफिर मशवरा यहाँ इबादत का देता हे |
कमाल हे हमें फिर भी ठीक होने का भरोसा हे
जब की मरीज यहाँ पर दवाए बीमारी की देता हे |
मुझे जिससे सबसे ज्यादा खतरा हे
वही आदमी भरोसा मेरी हिफाजत का देता हे |
तुझसे नाराज होने का रास्ता कहा बचा
इश्क मोका कहा शिकायत का देता हे |
गुजरते हुए लम्हे में अब तक ठहरा हूँ
खुशबु तेरी चुराकर रब हवाओ को देता हे |

Monday, March 10, 2014
Topic(s) of this poem: love
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