चल गुस्ताखी करे Poem by Nageshwar Panchal

चल गुस्ताखी करे

Rating: 4.5

चल गुस्ताखी करे
ना हो अधूरी कोई
आरज़ू मुझसे
ना हो अधूरी कोई
जुस्तजू तुझसे
ख़ामोशी की रात में
सारी गुफ्तगू करे
चल गुस्ताखी करे
में हटा दू
शर्मो हया के परदे
तुम तोड़ दो
सामाजि रस्मे
तू अर्जी दे मेरी
आँखों में कोई
पूरी हो चाहत
बाहों में कोई
रूह को खुद की
बदन से रूबरू करे
चल गुस्ताखी करे

Monday, March 10, 2014
Topic(s) of this poem: romantic
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success