में रूठ गया खुद से तुझे मनाने मे Poem by Nageshwar Panchal

में रूठ गया खुद से तुझे मनाने मे

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जिन्दगी गुजर गई मोत को पाने मे
चिराग बुझ गया मेरा तेरा चिराग जलाने मे
तन्हाई का दर्द बिछड़ने के बाद पता चला मुझे
में रूठ गया खुद से तुझे मनाने मे |
दर्दे दिल बेरहम हे बड जाता हे बताने मे
जमाना लगा हे मेरे जख्म पर नमक लगाने मे
लोट कर आएगी मेरे तलास में तू
में रो रहा हु अन्दर से तुम्हे हँसाने मे|
में रूठ गया...............
मिलने आती हे जब डरे डरे सुनी राहो में
हम सब कुछ पा लेते हे खोकर उनकी बाहो मे
चाँद भी उनके सामने फीका दिखाई पड़ता हे
उनके रूठने पर सारा जमाना रूठा दिखाई पड़ता हे
सारी सीमाए सारे संस्कार तब धुल जाते हे
डूबते हे मोहबत के समंदर में तो साहिल को भूल जाते हे
देर हो जाती हे पहुचते पहुचते आसियाने में
में रूठ गया...........

Monday, March 10, 2014
Topic(s) of this poem: sad
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