आज़ाद मुल्क का ये गुलाम आदमी
हर चौखट पे ठोकता सलाम आदमी
बिक रहा है कौड़ियों के दाम आदमी
सर पे उठाए हुए इल्ज़ाम आदमी
रोज़ लौटता है नाकाम सरेशाम आदमी
कुल अंधेरों में गुम गुमनाम आदमी
हैं गर्दिशे अय्याम में तमाम आदमी
है जानवर सी ज़िन्दगी बस नाम आदमी.......
-मगर झाड़ कर अब गर्दे आलाम आदमी
सुलगते सीने में लिए कोहराम आदमी
तिश्नालबों पर ले कर पैगाम आदमी
इक दूसरे का हाथ ले थाम आदमी
ताक पर रख कर अंजाम आदमी
पी हलाहल, तोड़ कर अब जाम आदमी
निधड़क सड़क पे आ गया है आम आदमी
कैसी यह सरकार है लगा हुआ दरबार है
एक अदद रानी है और एक राजकुमार है
हर एक दरबारी यहाँ फरमाबरदार है
जो सरदार था हमारा, बेअसरदार है
वो चारागर हमारा खुद बड़ा लाचार है
निज़ाम तार तार है देश बड़ा बीमार है
सत्ता है, हफ्ता है और भ्रष्टाचार है
नगरी अंधेर है लुटा लुटा बाज़ार है
आर है न पार है नाव बीच मझदार है..........
-पर दूर कहीं उफ़क पर उठ रहा गुबार है
सिंधु के भाटे में भी आ रहा ज्वार है
बुझी हुई राख में दबा हुआ शरार है
होने को फलक पे इक शोला नमूदार है
लोहा भी गरम है और चोट भी तैयार है
जल रहा है आसमां और तप रही है ये जमीं
ऐसे में अब सोचे क्या अंजाम आदमी
निधड़क सड़क पे आ गया है आम आदमी
ये देश किसी के बाप की जागीर नहीं
ये देश किसी के नाम की जायदाद नहीं
आज़ाद हो कर भी भला क्यों हम आज़ाद नहीं
हक की लड़ाई में कोई अर्ज़ नहीं फरियाद नहीं
ये देश किसी के मज़हब का मोहताज नहीं
हमको आम राज चाहिए कोई रामरहीम राज नहीं
रथयात्रा नहीं जिहाद नहीं दंगा नहीं फसाद नहीं
अब और होने देंगे इस देश को बर्बाद नहीं
ये देश हमारी धरोहर है तेरे सर का ताज नहीं
हमें कुछ भी मंज़ूर नहीं जो पूर्ण स्वराज नहीं
सर पर जो छत नहीं और पेट में अनाज नहीं
तो वोट नहीं सत्ता नहीं कुर्सी नहीं राज नहीं
न कर हो न कमल हो बस उसूलों पर अमल हो
इनके कर कमलों ने है देश हमारा लूटा
ये हातिम जो बन रहा है, हाकिम है बड़ा झूठा
कान धरो सुखलाल जी, तुम भी सुनो अशरफ मियां
इक दिन जो इक जाँ हो गए इस देश के हिंदू मुसलमां
तो रह जायेगी धरी यहाँ इन हाकिमों कि हाकिमी
है खुदा भी इस खल्क में बनाम आदमी
तो आदमी का कर ले एहतराम आदमी
फिर अल्लाह आदमी और है राम आदमी
निधड़क सड़क पे आ गया है आम आदमी
रोके से अब रुकेगा न बहाव इस सैलाब का
है गली गली में गूँज रहा नारा इन्कलाब का
है राख में से जी उठा परिंदा सुर्खाब का
ये वक्त है हिसाब का ये वक्त है जवाब का
उचटी हुई नींद का, टूटे हुए ख्वाब का
है हाथ में हमारे अब हक इंतखाब का
गुज़र गया जमाना जी हुज़ूर जी जनाब का
तार तार कर देंगे रेशम तेरे नकाब का
छट रहा है फलक से अब्र तेरे अज़ाब का
है बादलों से झाँक रहा हाला आफ़्ताब का
राह में भटक लिए भीड़ में खो लिए
तड़प लिए रो लिए गम के फसाने हो लिए
है जोश में बदल रहा, माहौल जो था मातमी
भाप बन रही है अब अश्रु श्वेत की नमी
निधड़क सड़क पे आ गया है आम आदमी
साड्डा हक्क ऐथे रक्ख हाथ में ख़ैरात नहीं
तिल तिल करकर रोज़ मरूं ऐसे तो हालात नहीं
मुझे ज़िंदा ज़िन्दगी चाहिये मौत सी हयात नहीं
मेरा कोई हक छीने किसी के बस की बात नहीं
आज़ाद खुद-मुख्तार हूँ मैं, किसी का मोहतात नहीं
मेरी कोई जात नहीं, मेरी कोई जमात नहीं
मैंने सूरज देख लिया है, अब मेरे हिस्से रात नहीं
ये देश तेरी शतरंज की बिछी हुई बिसात नहीं
मैं अब वो प्यादा नहीं जिसकी कोई औकात नहीं
इक चाल में खेल बदल दूंगा कोई शह नहीं कोई मात नहीं
सर पे बांध लिया कफन, किस बात की फिर है कमी
तकदीर लिखेगा देश की बेनाम आदमी
निधड़क सड़क पे आ गया है आम आदमी
बहुत जला ली हमने चौराहों पे मोमबत्तियाँ
बहुत सह लिए तुम्हारे सितम और ये सख्तियाँ
उफ़! यह क्म्बख्तियाँ, तुम्हारी ये बदबख्तियाँ
खींच लो ये कुर्सियाँ और तोड़ दो ये तख्तियाँ
तूफां में ले आये हैं हम भी अपनी कश्तियाँ
घर घर में शंखनाद है जाग उठी हैं बस्तियां
एक ठप्पे से मिटा देंगे ये अहम और ये हस्तियां
हम पानी का पानी दूध का दूध करने आये हैं
जर्रे जर्रे की सोच में बारूद भरने आये हैं
ये निज़ामे नीरो नेस्तोनाबूद करने आये हैं
तेरे ज़ुल्म का ज़ियाँ समेत सूद भरने आये हैं
भटके हुओं को राह पे मकसूद करने आये हैं
सफेदपोशी को तेरी आलूद करने आये हैं
है तेज़ाब सा बरसात में, हवा भी है गंदमी
धुल रही है धूल वो आँख पर थी जो जमी
निधड़क सड़क पे आ गया है आम आदमी
आम हूँ कतई मगर कमजोर नहीं मजबूर नहीं
मखमूर नहीं मगरूर नहीं सत्ता के नशे में चूर नहीं
सर में कोई सरूर नहीं किसी फिरके का फितूर नहीं
ताज के लिए ईमां तज दूं ये मेरा दस्तूर नहीं
रास्ते का पत्थर हूँ में कोई कोहिनूर नहीं
चुभ जो गया पाँव में तो मेरा ये कसूर नहीं
ये नूर तेरे फानूस का हरगिज़ मुझे मंज़ूर नहीं
मैंने शमां जला ली है अब मेरी कबा बेनूर नहीं
माना कि मेरी जात में वो शानोशौकत शऊर नहीं
पर जो निकल पड़े है सड़क पर तो दिल्ली भी अब दूर नहीँ
जो अकेला था, वो बन गया आवाम आदमी
अब पा ही लेगा मंज़िलो मुकाम आदमी
निधड़क सड़क पे आ गया है आम आदमी
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