आस्था Poem by Shobha Khare

आस्था

जब है रब पर आस्था, तब काहे घबराए
उसकी किरपा से तेरा दुख भी सुख हो जाए
जितना भी उसने दिया, कर उसको स्वीकार
कह दे तेरा शुक्रिया, जग के पालनहार
जो भी तूने दिया, हस कर किया कबूल
वो कांटे हो राह के या गुलाब के फूल II

Thursday, April 23, 2015
Topic(s) of this poem: life
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