कर्मो का अंजाम Poem by Shobha Khare

कर्मो का अंजाम

है छोटी सी जिंदगी सीमित तेरी श्वास
हंस कर इसको काट दे, काहे भया उदास

पूंजीपतियों का हुआ, टुकरे टुकरे जाल
एक कवि होता नहीं कभी बिकाऊँ माल


यार कलयुगी सामने, कहे फूल सी बात
पीठ फिरी तो कर रहा, पत्थर की बरसात

प्राणी इस संसार मे, चाहे जितना रोए
समय नहीं अनकूल, तो कोई काम न होए

स्वर्ग नरक है कल्पना, है असत्य ये धाम
यही भुगतना पड़ेगा, कर्मो का अंजाम II

Tuesday, May 19, 2015
Topic(s) of this poem: life
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