ज़िंदगी Poem by Shobha Khare

ज़िंदगी

SHOBHA KHARE- -

लम्हे का भरोसा नहीं कब ज़िंदगी छूट जाये,
फिर क्यो मौत का डर दिल मे उबलता रहता है I


जानता है परवाना कि जल जाएगा उसके पहलू मे,
फिर क्यो शमा को देख कर वो मचलता रहता हैI

कुछ भी हो मगर जिंदिगी बड़ी दिलचस्प है दोस्तो,
मंज़िल वो ही पाता है जो हर हiल मे चलता रहता है I

हर ठोकर से मेरी मानो तो एक सबक सीखो दोस्तो, ,
एक इंसान ही तो है जो गिर गिरके समहलता रहता है I

Tuesday, June 23, 2015
Topic(s) of this poem: life
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success