जादू Poem by Shobha Khare

जादू

चाँद का सर्द धुआँ
चाँदनी बन तैर गया
छल्ले बन बादलो सा
हवाओं मे फैल गया I

इस धुंध भरी रोशनी मे
एक जादू सा बिखर गया;
तुम्हारी यादे जलती बुझती

टिमटिमाती नछ्त्रावलियोंसी
मन के कोने मे उतर पड़ी II

Sunday, July 19, 2015
Topic(s) of this poem: life
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