रात गयी चमकिले अक्षर भी खो गये!
सुबह सिर्फ बारिश की बूंदों का
अहसास था, वो मनोरम लाली न थी,
घटा के कंबल को ओढ़े ठिठुरता सबेरा था
मन की कोयल कुहुक रही थी पर सुर न थे,
खामोशी ही सुर बन गयी थी II
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem