अक्षर Poem by Shobha Khare

अक्षर

रात गयी चमकिले अक्षर भी खो गये!
सुबह सिर्फ बारिश की बूंदों का
अहसास था, वो मनोरम लाली न थी,
घटा के कंबल को ओढ़े ठिठुरता सबेरा था
मन की कोयल कुहुक रही थी पर सुर न थे,
खामोशी ही सुर बन गयी थी II

Sunday, July 19, 2015
Topic(s) of this poem: life
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