मौजों से जो लङता हूँ, किनारे रूठ जाते हैं Poem by Abhishek Omprakash Mishra

मौजों से जो लङता हूँ, किनारे रूठ जाते हैं

मौजों से जो लङता हूँ, किनारे रूठ जाते हैं
भरी मंझधार में सब के, सहारे छूट जाते हैं
बिना तेरे मेरे सपने सनम कुछ इस तरह टूटे
बिछङ कर चाँद से जैसे, सितारे टूट जाते हैं
'कवि अभिषेक ओमप्रकाश मिश्रा

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