मौन इकरार तुम्हारा प्यार का
मेरे दिल ने चुपके से सुना
उच-नीच के परिधि तोड़के
क्षितिज ने झुककर धरती चुमा ।
लुभाती पलकोंनीचे
काजल से सजे मृग नयन
आँख जब मारी, उन नयनों ने
में धायल हुवा, प्रणय वाण से ।
शिखरों को चुनौती देती हुई
वह तुम्हारी बक्षों का उभार
और भरे नितम्बो का भार तले
धरती डरकर, काप गई।
दिन में हीं चाँद निकला
ना डूबते सूरज देवता
बेकाबू कितना ये दोनो
तुम्हारी जिस्म का मादकता देखने ।
मृग नयनो ने मोहनी लगाई
बक्षो उभार ने तृृष्णा जगाई
तुम्हारी हुस्न के मादकता ने
बिना पी के मदहोश बनाई ।
रचनाकारः- तुल्सी श्रेष्ठ
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