सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (2 1- 25) Poem by Tulsi Shrestha

सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (2 1- 25)

देखते होगे तुम्हारी राहें
वाटिका के रंगीन फूलों
बेकरार क्यो हैं वो सब इतने
गिरने तेरी आंचल में ।

यह क्या हो गया घोर आश्चर्य
जब पहुंची तू वाटिका में
छोडके रंगीन पुष्प कलियां
झुम गया सब भमरा तेरी देह में ।

देखकर सृष्टि का अनमोल तोहफा
बेचन होकर स्वर्ग की परीयां
पहुचे शिकायत करने ब्रह्मा के संग
अन्याय हुआं, प्रभू हमारे साथ ।

कैसा हैं ये रुप का जादू
प्रफुलित हो गया ब्रह्मा स्वयम्
गर्व हुआ सारा जगत को
देखकर सृष्टि का अनुपम रुप ।

तू हींं मेरे लिए
शुभ प्रभात की पहली किरण
तू हीं है मेरी जिंदगी
तू हीं हैं मेरी दिल की धड़कन ।

रचनाकारः—तुल्सी श्रेष्ठ
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Sunday, September 27, 2020
Topic(s) of this poem: flower,god,heart,love
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