सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (31- 35) Poem by Tulsi Shrestha

सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (31- 35)

तू हीं तो हैं, जिसे अपना समझकर दर्द कहूं सकू
तू हीं तो है, जिसे अपना सुख बाटू ।
कौन है मेरा ईस दुनिया में
तू हीं तो हैं, जिसे मैं अपना कहूं ।

काश! तुम मिल जाए मुझको
नहीं चाहिए जन्नत मुझे ।
सोना चांदि क्या चिज हैं
अनमोल नहीं तुझसे बढकर ये ।

तेरी गोद मे सोने मिले तो
उर्वशी भी नहीं चाहिए मुझको ।
तेरी आँचल की छहरा मिले तो
वसंत झुतु भी नहीं चाहिए मुझको ।

तेरी चरण के प्रवेश संग
मंदिर की घण्टी खुद हीं बजा ।
आरती दीप प्रज्वलित हुआ
सौंदर्य की देवी की आगमन से ।

मृत्यु और जीवन कि बीच
था में गहरा मझधार में
निष्प्राण देह को स्पनदन मिला
मेरे जीवन में, तेरी आने से ।

रचनाकारः- तुल्सी श्रेष्ठ
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Thursday, October 1, 2020
Topic(s) of this poem: beauty,death,life,love
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