सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (36- 40) Poem by Tulsi Shrestha

सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (36- 40)

आंसू बिना के ये रोदन कैसा
गति बिना के जीवन जैसा ।
अर्थ क्या रहता है बोल सजनी
तुम बिन अब मेरा जीवन ।

जब मैं पिघला हिम जैसा, तेरी आगोश में
मृत इच्छावों को जीवन मिला ।
कली खिली वृक्ष-लतावों में
हरियाली छाई नंगे पर्वत में ।

पिघल गया पाषाण
और रिसने लगी मशान ।
बह गई मेरा क्रोध के आवेग
तेरी नयनों की अश्रू की धार से ।

सिर्फ पलभर की, तुम्हारी बिछोड से
मन खोया, तन तड़पा ।
ढलने लगा जीवन की सब तरंग
हो गया लाचार प्यार की उमंग ।

तुम्हारी आकृति दिवा सप्न बना
पीड़ा दर्द का आलम बना ।
चेन हरा, नयनों रसा
करवट बदलते बदलते रात कता ।

रचनाकारः- तुल्सी श्रेष्ठ
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Thursday, October 1, 2020
Topic(s) of this poem: anger,dream,life,love,tears
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