सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (41- 45) Poem by Tulsi Shrestha

सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (41- 45)

अन्धो के लिए ज्योति प्यारा
लाश के लिए जीवन प्यारा ।
मेरे लिए ईस घर्ती पर
नहीं कोई प्यारा, तुझसे बढ़कर ।

बलखाती तेरी कमर बीच
कितना सुन्दर नाभी प्रदेश ।
जब होश खो बैठा ब्रह्म ऋषि
लजाकर तू भागी, मोहिनी बनकर ।

मृग निहारते, तेरी चंचलता
मोती बरसाते तेरी मुस्कान ।
नचा दाला मयूर को तेरी सौंदर्य ने
मुझे मदहोश कर दिया तेरी यौवन ने ।

दो गुलाबी अधर बीच में
मुस्कान बिखरते मोती के दाने ।
हसकर तू जब बोलती
गूंज उठी सरगम की झंकार ।

कितना कोमल तुम्हारी जिस्म
फूल गुलाफ का पत्ता जैसा ।
ना छू ते तो, दिल नहीं भरता
छू लेने सें, खरोच लगता ।

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Tulsi Shrestha

Tuesday, October 27, 2020
Topic(s) of this poem: beauty,life,lips,love,tulsi
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