सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (46- 50) Poem by Tulsi Shrestha

सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (46- 50)

अंधेरा चीरकर बिजुली चमकी
तेरी यौवन की छवि देखने
मौके कि वहीं पल में
बरसात तेरी देह में टपकी ।

गौरव ठानली हरियाली पर्वत ने
तेरी सौंदर्य की उपमा बनने
माना मनोहर झरना ने भी
तेरी यौवन की वेग थामने ।

तेरी सौंदर्य का प्रतीक बना
वन उपवन का पुष्प वाटिका ।
संतुष्टि और सौंदर्य का अनुपम मिश्रण
तुम्हारी देह का यौवन बना ।

वृक्ष समझकर काला नाग ने
चढा नितम्ब चुमते लंबे जुल्फ
मुकुट बना, व शिर पहुचकर
भूल गया व तो, तुझे काट्ने ।

गूंजगया तेरी पैरों के साथ
लयबध्द पायल का छमछम झंकार ।
जरुरत नहीं पड़ा कोहीं वाध्यवाधन
गाने हम्हारी प्रीत गीत को ।

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Tulsi Shrestha

Tuesday, October 27, 2020
Topic(s) of this poem: beauty,dance,love,lust,nature,tulsi
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