शुभ प्रभात की लाली जैंसा
स्वर्ण गुलाबी तेरा चेहरा ।
पुष्प लता की मेहक देती
तुम्हारा जिस्म की ज्वाला ।
छेड़ के पवन ने तेरी आँचल उदाया
बर्षा ने तुझ को पारदर्शी बनाया ।
जब छलक गई, तेरी सब यौवन
मेरा मन धड़का, तन बहका ।
लालीमा छाई तेरी चेहरे पे
आँधिया चला लोभी मन में ।
आग लगा मेरा तन में
तू पिघली मेरे आगोस में ।
तेरी जिस्म की मादकता कैसि
सोमरस को लजवाने वाले जैसि ।
ना पी के भी मदहोश होगया मैं
तुम्हारा यौवन का रसपान ऐसा ।
लता वृक्ष से लीपटी जैसे
दो जिस्म का संगम ऐसा ।
रमण छोडके नाग जोड़ी
निहार ने लगा हम्हारा मिलन ।
रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
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