पहुचे नदि जब सागर में
फिर वापस आगई मेघा बन के ।
यह सब रीत दोहराया उसने ।
सिर्फ तुझे बार बार देखने ।
प्रतीक बना तेरी आंसू का
सब सागर का नमकीन पानी ।
बिम्ब बना तेरी चचंलता की
कल कल बेहती नदि के पानी।
सब सागर एक साथ उबला
जब तेरी नयनों से आंसू छलका ।
कयामत लाया उन नयनों ने
प्रणय कुण्ड़ की भवर अंडर।
जो प्रीत गीत तुम गाते
आसमा ने वो सब दोहराया ।
और कल कल बेहती नदियां
भर देता उसमे मनोहर संगीत ।
रेगिस्तान पर भी हरियाली छाया
पीछा करते तुझे, मेघ जो पहुचा ।
तुम्हारा चरण का स्पर्श भी
अविरल बर्षा की कारण बनी ।
रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
@Copyright Reserved
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem
बहुत सुन्दर कविता एवं प्रेम के वियोग पक्ष की अद्वितीय अभिव्यक्ति. शेयर करने के लिए आपका धन्यवाद.